।। रविश कुमार, अर्नब, राजकमल झा और अन्य नौटंकी ।।

राजू परुळेकर

ravish

एनडीटीव्ही इंडिया‘ के संपादक और पत्रकार रविश कुमारजिनका पूरा नाम भी मैं जानता हूँपर वे नही चाहते कीउनका पूरा नाम लोगों के सामने आए

किसी के जीवनमें दखलअंदाजी करना मुझे पसंद नही हैंजब तक वह व्यक्ती सार्वजनिक जीवन में अपनी कोई निजी चीज का सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल ना करे.
खैरवो बात नही हैरविश कुमार अपने नाटकीय अंदाज मेंएनडीटीव्ही‘ के संसाधनों का इस्तेमाल करके लोगों के सामने अलग अलग नाटक पेश करने के लिए मशहूर हैं

असल में मुझे रविश की एक बात अच्छी लगती हैं कीवे दिल्ली के लुटियन सर्कल‘ (https://en.wikipedia.org/wiki/Lutyens%27_Delhiके अविभिन्न अंग हैपर ना ही वेसेंट स्टिफन्स‘ के छात्र हैं और ना ही वे जेएनयूमें पढे हैना ही उन्होने किसी विदेशी युनिव्हर्सिटी या आयव्ही लीगसे  डीग्री हासिल की हैं

लेकिन फिर भी उन्होंनेदिल्ली के लुटियन सर्कल‘ में जगह बनायी हैयह अपने आप में एक उपलब्धी‘ हैंइससे आपको चारपाच पुरस्कार तो मिल ही जाते हैउपर से आपको निष्पक्षता और स्वतंत्रता‘ का ठेका अपने आप ही मिल जाता है

रविश बिहार से आये हैचूँकी वे बिहारसे आये हैउन्होंने देश की भयंकर गरिबी को देखा हैं और वे एनडीटीव्ही‘ जैसी संस्था के एक हिस्से का नेतृत्व कर रहे हैजिससे उनके पास वह सारे संसाधन आ गए हैंजिनका इस्तेमाल करके अपने नाटकीय अंदाज में वे गरीबी पेश कर सकते है! 

ज्यादातर लोग गरिबी पर भाषण देना और अपने आपको गरिबों के दु:ख का साझीदार बनने का नाटक करना और उसे नाटकीय अंदाज में पेश करने कोसोशालिस्ट इंटलेक्च्युअल‘ मानना शुरू करते हैंचाहे वो सोशालिस्ट हो या ना हो! इंटलेक्च्युअल हो या ना हो! 

आज देश का कोई चॅनल या मीडिया हाउसपब्लिक रिलेशन कंपनी बने बिना या इंटरनॅशनल फंडिंग और व्यवस्था का फायदा उठाए बिना चल नही सकतारविश जो बात करते हैवो सीधी तरह एक Propaganda (प्रचार )है.

उनके पास एक बडा चॅनल हैएक कुर्सी है और एक चतुरता हैइस चतुरता से वे अपने आप को बाकी लोगों से अलग रखने की कोशिश करते हैं या बाकी लोगों से अलग छबी बनाने में कामयाब भी होते हैंवो हर गलत और कुतर्क के साथ वे एक लाइन जोड देते है की, ‘इसका मैं भी एक हिस्सा हूँ‘ या फिर यह भी कहते है की, ” हो सकता है कीमैं भी गलत हो सकता हूँ.”

वास्तविकता मेंदेश में दिल्ली और मुंबई से चलनेवाले चॅनल्स और पत्रिकाओं मे संपादक वही बातें लिखते हैजो रविश कहते है. जो बाते बहुत सीमित होती हैं और अपने मालिक के प्रचारतंत्र से पुरी तरह से प्रभावित होती हैं

आज देश का पुरा मीडियामीडिया हाउस चलानेवाले जो मालिक हैं उनके तंत्र से चलते हैं और संपादक वही बात करता हैं जो मालिक या इनव्हेस्टर्स चाहते हैं.
रविश कुमार का छद्म यह हैं कीवे कुछ भी अलग नही करतेबस वे विश्लेषण की जगह नाटक करते हैनिष्पक्षता की जगह मैं भी गलत हो सकता हूँयह लाइन बार बार थोप देते हैं.
लेकिनउनके जैसे अन्य संपादकों की तरह ही वही सारे निष्कर्ष हमारे सामने रखते हैंजो पहले से ही तय हैंकिसी और काAgenda है, और propaganda है

असल में एक हायपोथिसिस‘ से लेकर कन्क्लूजन‘ तक का सफर उनके किसी भी प्रोग्राम में नही होता हैंअपने जिन साथियों का वे कडा विरोध करते हैउनसे वे बिल्कूल अलग नही हैं.

मुंबई के स्टुडिओ से रोज नाटकीय प्रोग्राम करनेवाले अर्नब गोस्वामी जिन्होंने हाल ही में इस्तिफा दिया है, उनके खिलाफ मानो रविश कुमारने जंगही छेड दी थी. 

असल में देखा जाए तो रविश कुमार अर्नब गोस्वामी के अन्तरंग मित्र (अल्टर इगो ) है. दोनों का Psycho-dynamics एक जैसा ही है. 
दोनो अपने प्रोग्राम थिएटर करते है, ना की उसमें लोगों के प्रति आदर और वास्तविक रुपसे निष्पक्ष चर्चा होती है. जहाँ अर्नब 'You' कहते है, वहाँ रविश कुमार 'I' कहते है. 

अर्नबने अपने थिएटर के लिए आक्रमकता को एक बहुत बडा मंचीय साधन बना दिया था, जिसमें वे सामनेवालो को कोसते थे, परपीडन होता हैं, जिससे लोग बडा ही लुत्फ उठाते हैं. परपीड़न में जो Catharsis है, वही Catharsis आत्मपीड़न में भी है. 

रविश कुमारने यह जान लिया हैं की, उनके हिंदी दर्शक उन्हे तभी नायक बनायेंगे जब वे आत्मपीड़न की तरफ बढेंगे. एक 'मिनी गांधीजी' का किरदार बखुबी निभाएंगे और आत्मपीड़न का एक मॉडेल एक घंटे या जादा व्यक्त के लिए नाटकीय अंदाज में पेश करेंगे जिसको मध्यम वर्ग और गरीब हिंदी भाषी अपना मानेंगे और जिसका नायकत्व अपनेआप रविश को बहाल होगा!
अपनी छबी, रविश कुमार हो या अर्नब गोस्वामी हो, या अन्य ऐसा कोई संपादक जो टीव्ही पर नायक बना बैठा हैं उसे बहुत पसंद होती है. अर्नब और रविश कुमार "अन्तरंग मित्र" है .क्योंकी 'पीडन' ही उनका सबसे बडा हथियार हैं! 
हम दर्शकों को पीड़न बहुत ही अच्छा लगता है, चाहे वह परपीड़न हो या आत्मपीड़न. क्योंकी हमें यह मालूम हैं की, इस देश में अनंत ऐसी समस्याएँ है, जो अपने जीवन से जुडी हैं जिसका कोई समाधान नही है. 
अगर वास्तविक रुप में इसका समाधान ढूँढना हैं, तो इसे लेनिन, मानवेंद्रनाथ रॉय, राममनोहर लोहिया या जयप्रकाश नारायण (और ऐसे अन्य कई दार्शनिक जो देश में और विश्व में पैदा हुए) इन जैसे एक विचारक बनकर एक दार्शनिक रचना करनी होगी, जिसके आधार पर संपूर्ण क्रांती की सफल या विफल कोशिश की जा सकती है. चॅनल से तनखा लेकर ऐसी क्रांती नही की जा सकती! ना ही ऐसी कोशिश भी की जा सकती है!
 रविश कुमार यह बहुत अच्छी तरह से जानते है. वास्तविकता में सारे चॅनल्स के अँकर बने बैठे संपादक ये बात अच्छी तरह से जानते है. उन्हें एक "डेली सोप" की तरह लोगों के मन के जख्मों को इस तरह से कुरेदना हैं की, जख्म ठीक तो नही हो सकती लेकिन जख्म के इर्दगिर्द फैली हुई खुजली बढती रहे और उसे खुजाने का समाधान भी मिले! रवीश कुमार इस खुजली समाधान के मास्टर हैं! बस्स! 
किसी और को पीडा देकर अंग्रेजी जाननेवाले, पॉलिसी-मेकर दर्शकों के लिए अर्नब जो करते है, वही रविश कुमार हिंदी जाननेवाले करोडो दर्शकों के लिए 'मैं' को शामिल करके करते है. दोनों कें खुजाने की स्टाइल अलग हैं, दोनों के दर्शक भी अलग हैं, लेकिन दो चीजें समान हैं - . दोनो डेली सोप चलाते हैं और २. दोनो अपने आप टीव्ही के नायक बनाने में कामयाब हो जाते है. 
दोनो भले कहानी अलग चुनते हो, करते तो बस एक नाटक है, जिसमें एक आभासी दुनिया होती हैं, जिसका 'प्लॉट' कभी 'देशभक्ती' होता हैं, कभी 'देशभक्ती से बडी वैश्विकता' होता है, कभी 'स्वतंत्रता' होता है, तो कभी 'निष्पक्षता' होता हैं. इसमें से कोई चीज वास्तविक नही होती, सारी चीजें आभासी होती है. 
दर्शक यह बात अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन अपनी रोजमर्रा की दर्दभरी जिंदगी से इस 'वास्तविक आभासी' दुनिया का मनोरंजन उन्हे अच्छा लगता है, उनके जख्म के इर्दगिर्द खुजाने जैसा... 

मैंने इस लेख में इन दोनों का जिक्र किया इसका मतलब यह नही की, यह इन्ही दोनों के बारे में है. यह लेख रविश कुमार के बारे में हैं, लेकिन उस पर आने से पहले एक बात मैं कहना चाहूँगा की, रविश कुमार कोई ऐसे पहले नायक नही है. 

प्रणव राय से लेकर राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त और जितने भी आप नाम लो, यहाँ तक की अरुण शौरी जब 'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादक हुआ करते थे उनसे लेकर कल प्रधानमंत्री के सामने असभ्य रुप से तंज कसनेवाले राजकमल झा तक सभी यही करते हैं. इनमें से कोई 'पायोनियर पत्रिका' में काम करता है और 'पायोनियर पत्रिका' से तनखा लेता है तो अचानक देशभक्त बन जाता है और जब वह 'टेलिग्राफ' में आता है तब उसे वामपंथ का आविष्कार होने लगता है. जैसे की BHU से आप JNU में गए हो!
मेरे निजी अनुभव में मैने देखा हैं की, मैं जब 'टीम अण्णा' नाम की एक "गँग केजरीवाल" बनी थी जो आज पुरे देश के सामने Expose हो चुकी हैं. जब मैं उनके खिलाफ लड रहा था. केजरीवाल और उसके साथी इस देश के खिलाफ षडयंत्र रच रहें है, यह साबित करने में मैं लगा था तब पूरा देश मुझे गालियाँ दे रहा था. 

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देश तब ये समझ रहा था की, इन देशभक्तों की टोली को नाकाम करके मैं देशद्रोह का काम कर रहा हूँ. तब यही रविश कुमार, अर्नब, राजदीप, बरखा और अन्य चॅनल्स और पत्रिकाएँ हररोज केजरीवाल का इंटरव्ह्यू लेकर उसे भगतसिंग बनाने में लगे थे. 
रविश कुमार उनमें से ही एक थे. 'आयबीएन 7' के संपादक आशुतोष ने मेरे सच का "लाइव्ह ब्रॉडकास्ट" में अपमान किया था! 

केजरीवाल की किताब चोरी (स्वराज) से लेकर 'अमन होटल डील' में काँग्रेस के साथ हाथ मिलाकर सत्ता का रास्ता अपने लिए खुला कर दिया था! इन सारी बातों का मैने ही सबसे पहले एक्स्पोज करके खुलासा पब्लिक डोमेन में या चॅनल्सपर कर दिया था! (यह सारी बातें आप गूगल सर्च करके देख सकते हैं या www.rajuparulekar.us इस वेबसाइट पर या  rajuparulekar.wordpress.com पर देख सकते हैं), तब ये रविश कुमार जो आज सच के मसीहा बनने में लगे हुए है, उन्होंने केजरीवाल के खिलाफ उफ् तक नही किया. 

दुसरी तरफ रविश कुमार के "अल्टर इगो" अर्नब ने 'Kejriwal Rises' नामक प्रोग्राम लगातार चलाकर केजरीवाल के लिए सत्ता का रास्ता खुला कर दिया था. जब मैंने 'केजरीवाल टीम' के खिलाफ दिल्ली में  नोव्हेंबर २०११ में पहली प्रेस कॉन्फरन्स लेकर उसमें पटियाला हाउस कोर्ट में किरण बेदीजी की संस्थाएँ, केजरीवाल और उनके अन्य साथियों का घपला जिसके उपर पटियाला हाउस कोर्ट ने नोटिस दी थी उसका खुलासा किया और डॉक्युमेंट्स भी बाँटे, वहाँ पर रविश कुमार के 'एनडीटीव्ही इंडिया' के प्रतिनिधी मौजूद थे. 

कोर्ट के एव्हिडन्स देकर भी पहली बार किए गए इस खुलासे के बारे में रविश कुमार एक शब्द भी अपने चॅनल पर बोलते हुए दिखाई न दिए, ना ही उन्होंने अपना पक्ष रखने का मौका मुझे दिया. यहाँ तक भी हम उनकी 'निष्पक्षता' को समझ सकते है!! 

लेकिन वो ही 'टीम केजरीवाल' की सदस्या किरण बेदी जब भाजपा में गयी और दिल्ली की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बन गयी, तब रविश कुमार नायक बनके मैदान में कूद पडे और किरण बेदी के साथ साक्षात्कार करके उनके कथित 'झूठ' (?) को तारतार करने का (निष्पक्ष) मौका उन्होंने हासिल कर लिया और देश के सामने खूब चर्चा हो ऐसा ड्रामा पेश किया जिससे वे अपने आप को नायक साबित करने की कोशिश में ही दिखाई दिए. 

बाद में 'ट्विटर' पर जब मैने इस मामले में कई सवाल उनसे किये तो उन्होंने मुझे ब्लॉक कर दिया! मुझे इस बात से कोई रंजीश या गम नही क्योंकी, मैं भी कई लोगों को ब्लॉक कर देता हूँ. फर्क सिर्फ इतना हैं की, ना ही मैं किसी सार्वजनिक पद पर बैठा हूँ, ना ही किसी पद के लिए उत्तरदायी हूँ ! जो की रविश कुमार हैं. ऐसे कम से कम १०० से ज्यादा उदाहरण मैं दे सकता हूँ लेकिन मैं तर्क को उदाहरणों से सिद्ध नही करना चाहता. जो मुझे कहना हैं, वह कुछ और है.
रविश कुमार जिसके संपादक है, उस 'एनडीटीव्ही इंडिया' के उपर सरकार ने देश की सुरक्षितता से संबंध में गोपनीय बातें खुली करने के आरोप में एक दिन 'ऑफ एअर' जाने को कहा. 
हालाकी, यह पहली बार नही हुआ था. मनमोहन सिंग की पिछली सरकार के दस साल में बीस अलग अलग चॅनल्स "ऑफ एअर" किए गए थे, तो यह कोई Unprecedented नही था. 
२००७ में 'जनमत टीव्ही' को ३० दिन के लिए ऑफ एअर कर दिया गया था. 

लेकिन यहाँ पर सवाल 'एनडीटीव्ही इंडिया' का था और दिल्ली के लुटियन सर्कल के अपने आप को वामपंथी समझनेवाले अरबोंपती, जो अपने आप को इंटलेक्च्युअल भी समझते हैं वह सारे और उनके साथ प्रिंट और व्हिज्युअल मीडिया के एडिटर गिल्ड दोनो इकठ्ठे रुप से यह कोई असाधारण आपात्कालीन घटना मोदी सरकार की वजह से हो रही हैं ऐसा बवाल मचाने में लग गई. 

रविश कुमार हिरो बनने के लिए एक मूक थिएट्रिक्स प्रोग्रॅम (जिसका न्यूज चॅनल्स से कोई वास्ता नही होता) करके अपने नाटकीय अंदाज को और अपने झूठ की नीव को चरम पर ले गए और स्वयंघोषित इंटलेक्च्युअल समझनेवाले (जो की हैं नही!) पत्रकारों मे एक ज्वर सा दौडने लगा जो 'व्हायरल' था मगर 'ट्विटर'पर!! 
 पठानकोट हमले के बाद 'एनडीटीव्ही इंडिया' के इस लाइव्ह रिपोर्टिंग के कारण एक दिन की पाबंदी लगाई गयी :
. आतंकी आयुध भंडार से १०० मीटर दूरी पर पहुँच चुके हैं, जहाँ से दक्षिण में मिसाइल्स और रॉकेट्स रखे जाते हैं.
. वायुसेना हेलिकाप्टर उडान भर चुका हैं, किसी भी समय आतंकियों के छिपे हुए स्थान पर गोलियाँ बरसा सकता हैं.
. तीन तरफ से एनएसजी कमांडो आतंकियों को घेर चुकें हैं और दक्षिण की तरफ जंगल हैं, उस तरफ से घेराबंदी नहीं हैं
 'एनडीटीव्ही इंडियाका यह दावा रहा हैं कीसजा हमें मिली लेकिन यह सारी सेना के बारे में गोपनीय बाते अन्य कई चॅनल्सगूगल पर उस दिन दिखाई दे रही थी. क्या अन्य जगह गुनाह होते रहते है इस तर्क से हमारा गुनाह माफ किया जाएयह कहना जायज और जिम्मेदाराना हरकत हैं?
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यह सब बवाल दिल्ली में हो रहा था, तब Ramnath Goenka Award for Excellence in Journalism' का कार्यक्रम हो रहा था. उसके प्रमुख अतिथी थे, देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. 

प्रधानमंत्री पुरे देश का होता हैं और माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पुरे देश ने पूर्ण बहुमत से चुना हैं. संवैधानिक रुप से देश की जनता सर्वोपरी हैं और देश की जनता पूर्ण बहुमत से देश का नेता चुनती हैं तब वह अपने आप सर्वोपरी हो जाता हैं. 

विचारधाराएँ भिन्न हो सकती हैं, लेकिन संवैधानिक रुप से इस बात को असहनीय मानना, अस्वीकार करना अपने आप में अलोकतांत्रिक हैं. 

उस कार्यक्रम में एक-दो पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के हाथों से पुरस्कार लेने से मना कर दिया, कार्यक्रम पर बहिष्कार कर दिया. 

बात यहाँ तक सीमित नही हैं. प्रधानमंत्री के भाषण के बाद Vote of Thanks देने आये हुए 'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादक राजकमल झा प्रधानमंत्री पर अपने भाषण में तंज कसते रहे, जो बेअदब और बदतमीज था. 
क्योंकी, 
. माननीय प्रधानमंत्री राजकमल झा के गणमान्य अतिथी थे. 
. अगर निष्पक्षता की बात की जाए तो 'The other side is also important!' जो बात, Vote of Thanks के बाद अपनी बात रखने का प्रधानमंत्री को मौकाही नही था! एक तरह से उन्होंने अपने गणमान्य माननीय प्रधानमंत्री का खुले तौर पर अपमान किया, जिसे असहिष्णुता से कम कुछ भी नही कहाँ जा सकता. लेकिन जादा कुछ कहाँ जा सकता हैं!
बात बात में राजकमल झा ने एक और बात की, जो सफेद झूठ था. राजकमल झा ने कहाँ, सरकार अगर पत्रकार का विरोध करती हैं तो, यह बात पत्रकार को पुरस्कार की तरह माननी चाहिए. इस बात में साफ गडबड हैं...
. अगर ऐसी ही बात थी और राजकमल झा का conviction इसी बात पे ठोस था तो सरकार के सर्वोच्च प्रतिनिधी माननीय प्रधानमंत्री को उस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथी के रुप में उन्हें क्यों बुलाया गया? यह तो 'इंडियन एक्सप्रेस' का सेल्फी लेने से जादा बडा दिखावा था.
. प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी लेनेवालों के बारे में राजकमल झा को आपत्ती थी लेकिन दुसरे दिन समाचारपत्रों मे, सोशल मीडिया में और न्यूज चॅनल्स में प्रधानमंत्री के साथ राजकमल झा की तस्वीरे छपी थी वह अपने आप से प्रतारणा नही थी? 
. इस देश के राजकमल झा से कई गुना बडे, महान और जिनके नाम पर कई किताबें हैं ऐसे लेखक, पत्रकार, विचारक पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, भारतरत्न, ललितकला अकादमी और कई सारे पुरस्कार और फेलोशिप्स सरकार से लेते रहे हैं (चाहे सरकार बदलती रहें) क्या वे सारे लोग फ्रॉड थे? क्या उन्होंने अपना जमीर खोया था?
. अगर रिट्वीट करना इतना अनुचित है तो क्या 'इंडियन एक्स्प्रेस' अपने 'ट्विटर अकाउंट'पर Please Don't Retweet Our Tweets ऐसा लिख सकते हैं? उन्हें फौरन यह लिखना चाहिए!!
 या फिर राजकमल झा 'कथनी एक और करनी एक' को अपनी विचारधारा मानते हैं? ५० साल के राजकमल झा को यह कहना जरुरी हैं की, इसे 'अवसरवाद' (Opportunism) कहते हैं!
और आखिरी बात
. प्रधानमंत्री को कोई बात सुनानी थी, तो आपके हाथ में समाचार पत्र था, जिसका नाम 'इंडियन एक्सप्रेस' हैं! कलम थी! क्या आपका उन दोनों पर से विश्वास उठ गया था? या फिर अपने मेहमान का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से अपमान करना 'इंडियन एक्स्प्रेस' या राजकमल झा का मेहमाननवाजी और अवसरवाद का नया रुप हैं?
. क्या उस शाम राजकमल झा के शरीर में रविश कुमार की आत्मा घुस गई थी, जो एक रविश कुमार स्कूल की थिएट्रिक्स कर रहे थे. जिससे उन्हें एक नायक बनना था, जिसकी आस उन्होंने ५० साल दबा रखी थी, जिसका मौका उन्हें उस शाम मिल गया?
रविश कुमार 'एनडीटीव्ही इंडिया' की कुर्सी से उतरने के बाद कुछ भी नही रहेंगे! 
वे अपनी थिएट्रिक्स रामलीला मैदान में करने शुरू करे तो उन्हें देखने दस लोग भी नही आएंगे! उन्होंने हिंदी में जो दो-तीन किताबे लिखी हैं उसके कोई पाठक हैं भी या नही? क्या किसी ने उनकी यह किताबे पढी हैं? जो असल में पढने लायक भी नही हैं. बात रविश कुमार से शुरू नही हुई. 

बचपन में हमने 'इंडियन एक्स्प्रेस' के अरुण शौरी की थिएट्रिक्स भी देखी हैं, ड्रामेबाजी भी देखी हैं. कमसे कम वे थोडे इंटलेक्च्युअल तो हैं. बाकी लोग जैसे की, एडिटर्स गिल्ड के सारे सदस्य, रविश कुमार, राजदीप, बरखा दत्त और दिल्ली लुटियन सर्कल के लोग जो अपने आप को वामपंथी मानते हैं (पर हैं पुंजीपती!). जो अपने आप को इंटलेक्च्युअल मानते है (पर हैं अय्याश, दिमागी दिवालीयाँ). इसलिए उनके जीने का सहारा और उद्देशही खत्म हो गया हैं क्योंकी, वास्तव में वे वामपंथी भी नही है और इंटलेक्च्युअल भी नही हैं. 

इसलिए उन्होंने एक तरकीब ढूँढ निकाली हैं की, जो इस देश, देश की सेना और सबसे महत्त्वपूर्ण बहुमत से चुना हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध! जो उनके जीवन को सहारा और उद्देश दे देता हैं. 'इन तीन चीजों का विरोध करो और आप वामपंथी और इंटलेक्च्युअल होने का सर्टिफिकेट ले लो' यह एक षडयंत्र केजरीवाल टीमने शुरू किया और उसका व्हायरस दिल्ली लुटियन सर्कलने केरल से जम्मू-कश्मीर तक और प. बंगाल से मुंबई तक फैला दिया हैं. 
अगर आप सचमुच लोकतंत्र, निष्पक्षता, सहिष्णुता को माननेवाले व्यक्ती हो, तो आपको रविश कुमार, राजकमल झा और केजरीवाल जैसे प्रवृत्ती को विरोध और नेस्तनाबूत करने की शक्ती, धैर्य, हिम्मत और सहनशीलता दिखानी पडेगी! 

यह वक्त का तकाजा हैं! क्योंकी, हमे संवैधानिक रुप से देश की जनता को सर्वतोपरी मानना हैं ना की, रविश कुमार, राजदीप, बरखा, राजकमल झा, शेखर गुप्ता जैसे ड्रामेबाजों को! 

यह सारे या तो नौकरी करते हैं या पुंजीपती है. इनमें से कोई भी क्रांतिकारी नही हैं. ना ही क्रांतिकारी होने की उनमें कोई संभावना बची हैं! यह सारे लुटपाटवादी और अवसरवादी हैं. इसलिए हमें समझना चाहिए की, इनकी बातों से इस देश में कोई क्रांती या संपूर्ण क्रांती नही हो सकती. इनकी महिने की Salary या Profit Ratio आबाद रहे! 
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लेकिन, हम उन्हें देश, देश की निष्पक्षता, सहिष्णुता, लोगों का चुनने का अधिकार और लोकतंत्र इन्हे उनकी ड्रामेबाजी से बर्बाद नही होने देना हैं!
बाकी रविश कुमार (और अन्य) का ड्रामा चलता रहे!!

राजू परुळेकर
raju.parulekar@gmail.com
rajuparulekar@wordpress.com
www.rajuparulekar.us

 

 

 
 
 
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सांगली इंडियन मेडिकल असोसिएशन येथे घेतलेली माझी मुलाखत !!!

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माझी जात

​लेखकाला दुःखाचे मळे पिकवता आले पाहिजेत. लेखणीच्या एका फटकाऱ्यात रक्ताचे सडे घालण्याचे सामर्थ्य त्याच्यात असायला हवे. आपल्या लेखनातून वाचकाना हसवताना त्यांच्या पोटातल्या दुखा:चं भान राखता आलं पाहिजे. कवितेची कळ त्याच्या बेंबित जायला हवी…तिथुन वाचकाच्या नसेत..

“जगात सर्वांचं सुख सारखंच असतं, पण प्रत्येकाच्या दुःखाची जातकुळी वेगळी असते” असं टॉलस्टॉय म्हणाला होताच. 

हेमिंग्वे ” खरा लेखक हा कधीही सुखी होत नाही” म्हणाला ते त्यामुळेच…

हातात पेन असो, ब्रश असो वा पियानोची बटणं असोत ती या दुःखाच्या रसात वाजुन वाजुन झिजत जायला हवीत….

नाहीतर साक्षर खुप आहेत! ते लिहितात,छापतात, छापुन आणतात, कॅन्हवासवर रंग फासून त्याला चित्र म्हणुन खपवतात…

जगण्याचं उद्दिष्ट संपलं की खरा लेखक , कवि,चित्रकार, पियानिस्ट मरून जातो…

फक्त साक्षरच असतो तो फक्त  जिवंतच रहातो…

अमर होणं हे मेल्यावर सिद्ध होतं. आधी नाही.

बाकी उरतं ते आतलं जनावर…

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‘जी.ए’ नवसाला पावतात की…

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“युधिष्ठीर एवढा  मृदु होता कि दुर्योधनाला तो सुयोधन म्हणत असे. आजच्या काळात जर तो असता तर त्याने Badminton ला Goodminton म्हंटले असते”, अश्या काहीशा वाक्यांची संततधार आणि त्यातून निर्माण होणारा, तत्वज्ञान सांगणारा, अभिजात विनोद, जी. ए. कुलकर्णींच्या ‘माणसे अरभाट आणि चिल्लर’ ह्या पुस्तकात मी जेव्हा वाचला तेव्हा मला मराठीमध्ये फक्त कोटीबाज विनोदच होतात असे नाही ह्याचं खरं  समाधान मला लाभलं.

GA

 

जी. ए नी आयुष्यावर गारुड केल्याचा एक मोठा काळ त्यांच्या चाहत्यांच्या आयुष्यात येतोच. 

‘सांजशकुन’, ‘काजळमाया’, ‘रमलखुणा’, ‘हिरवे रावे’, ‘रक्तचन्दन’, ‘कुसुमगुंजा’, ‘इस्किलार’ ह्या आणि अश्या इतर पुस्तकातून जी. ए नी मला नियती, आयुष्यातील अपरिहार्यता, जगण्यातली निरर्थकता आणि तत्वज्ञाचा विराटपणा ह्याचं भान  त्यांच्या लेखनातून दिलं.

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व्यक्तिगत आयुष्यात जी.ए कुलकर्णी हे महान लेखक असले तरी ते एखाद्या बंद कुलपा सारखे होते. त्यावर स्वतंत्रपणे वाचण्यासारखं एक गोड पुस्तक जी. एं च्या मठाच्या आतपर्यंत पोहचू शकणाऱ्या, फार थोड्यांपैकी एक असलेल्या चित्रकार सुभाष अवचट ह्यांनी लिहिलेलं आहे. जी.ए हे जेवढ गूढ लिहित असत ते तेवढच स्वत: गूढ जगत असत. त्यांच्या आयुष्यातल्या अनेक घटना आपल्याला स्तिमित करून सोडतात.

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ते एखाद्या अंधाऱ्या गुहेतून थोडे, थोडे समजत आहेत अस वाटत राहतं. ते थोडं थोडं समजण हे शक्य झालं ते विदुषी सुनिता देशपांडे ह्यांच्याशी झालेला त्यांचा पत्रव्यवहार आणि सुभाष अवचट ह्यांनी लिहिलेले पुस्तक आणि आपल्यापर्यंत  पोहचवलेली माहिती नि असंच आणखी काही…

खर तर वैयक्तिक आयुष्यात जी. ए अतिशय साधे होते.

धारवाडमध्ये प्राध्यापक म्हणून काम करण्यापलीकडे ते फक्त कला व लेखन प्रपंच करत असत. त्यांना चिकटू पाहणाऱ्या कोणत्याही व्यक्तीच्या हाताला ते लागत नसत. त्यांना माणसांची घृणा आहे कि काय असं वाटावं इतके ते एकलकोंडे, एकांतप्रिय आणि गूढ जगत असत.

त्यांच्या जीवनाचा त्यांच्या लेखनावर खोल ठसा उमटलेला कायम जाणवत राहतो. पाश्चात्य व पौरात्य तत्वज्ञान, इंग्रजी भाषा, चित्रकला, अंतरराष्ट्रीय वाङ्गमय आणि ह्या साऱ्या पलीकडे असलेली आयुष्याची निरर्थकता ह्या साऱ्यात त्यांनी अटलांटिक समुद्राच्या तळाएवढी खोली गाठली होती.

सुनिताबाईंना त्यांनी लिहिलेली पत्र ज्या ओघवत्या शैली मध्ये ते लिहितात आणि ज्या सहजपणे वैश्विक साहित्य, शास्त्र, कला, तत्वज्ञान आणि अभिजातपणा ह्याचा ओघवता प्रवाह मांडतात ते आपल्याला थक्क करून सोडतं.

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‘काजळमाया’ ह्या त्यांच्या पुस्तकाचं मुखपृष्ठ हे त्यांनी स्वत: केलेलं पेंटिंग होत. पण हे खरं कि खोट ह्याचं गूढ त्यांनी कायम ठेवलं.

नोबेल पारितोषिक विजेता विल्यम गोल्डिंग ह्याचं पुस्तक ‘Lord of the flies’ ह्या नोबेल विजेत्या पुस्तकांचं मराठी भाषांतर जी.ए कुलकर्णी ह्यांनी केलंय.

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त्याच्या प्रकाशनाला खुद्द विल्यम गोल्डिंग उपस्थित होते, पण जी. ए. मात्र उपस्थित राहिले नाहीत.

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जणू काही भाषांतर झाल्यानंतर त्यांचं काम लेखक आणि माणूस म्हणून संपल अस त्यांनी दाखवून दिलं. 

त्यांच्या लेखनाला राष्टीय पुरस्कार मिळाल्याची आनंददायी घटना, त्यांनी त्यांच्या त्या पुरस्कारबद्दल, हल्ली फेसबुक वर येतात तश्याच एका अडाणी, नकारात्मक प्रतिक्रियेमुळे तत्काळ पुरस्कार परत करून ‘साजरी’ केली.
अश्या एक ना अनेक गोष्टी!

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पण एक हळवे जी.ए. पण होते.
त्यांची बहीण नंदाताई आणि भाच्या ह्यांच्यावर त्यांचा अपार जीव होता.
हा हळवा कोपरा त्यांच्या पुस्तकाच्या पहिल्या पानांमधून हळूच डोकावतो…

पूर्वआयुष्यातल्या अनुभवांनी माणूस एवढा झपाटून जातो, आयुष्याचा तळ शोधून काढतो आणि समृद्धपणे हे लिहून ठेवतो जे आपोआप नंतर वाचकांपर्यंत पोहचत. हे एका महालेखकाच उदाहरण आहे. कदाचित अर्नेस्ट हेमिंग्वे सारखं…

पोरसवद्या वयात म्हणजे शाळेत असताना मी जी.ए. यांचा ‘सांजशकुन’ हा कथासंग्रह प्रथम वाचला आणि मग झपाटून गेलो.

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मग जी.ए. नि जे जे लिहिलं ते वाचत गेलो.

त्यांचा ‘इस्किलार’ वाचताना ‘इस्किलार अल सेरिपी एली’ हा मंत्र म्हंटल्यावर जी.ए प्रगट होतात असे बरेच काळ मला वाटत राह्यचं.

आयुष्य ही एक संधी नसून आपला जन्म हे एक आपल्यावर केलेलं कोणीतरी चेटूक आहे हे ‘रमलखुणा’ वाचल्यावर मला वाटत राहिलं. किंबहुना आजही मला तेच वाटत….

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माझ्या आयुष्यात एक काळ असा आला कि जी.ए. यांच्या  अनेक कथा वाचून वाचून मला मुखोद्गत झाल्या. जी.एं च्या ख़ास अस्तित्ववादी शैलीत मी न्ह्याऊन निघालो.

त्या काळात मला पोच नव्हती, आत्मविश्वास नव्हता, मला जी.एं पर्यंत प्रत्यक्ष पोहचून भेटण्याचा मार्ग माहित नव्हता आणि माझं वयही नव्हत.
मला असं वाटायचं कि जी.एं सारखं लिहिता आलं पाहिजे.

 मला माझा मी सापडत नव्हतो तेव्हा जी.एं नी आपल्या लेखनाच्या निर्विकार आणि निर्विकल्प समाधी मध्ये मला खेचून घेतलं, यथेच्छ बुडवलं. 

मराठीतल्या अनेक महालेखकांना आणि महाकवींना त्यांनी आंतरराष्ट्रीय भाषांमध्ये लेखन केलं असत तर त्यांना सर्व आंतरराष्ट्रीय सन्मान आणि पारितोषिकं प्राप्त झाली असती. अश्यांमध्ये जी.ए. कुलकर्णी ह्याचं नाव अग्रक्रमाने घ्यावं लागेल.

जी.ए कुलकर्णी किंवा ह्यांच्या ताकदीचे लेखक किंवा ग्रेस ह्यांच्या सारखे कवी ह्यांचे इंग्रजी भाषेवर असाधारण प्रभुत्व होते तरीही आईच्या दुधाला जागून त्यांनी मराठीत लिहिलं.
आणि आपणा सर्वाना त्यांनी उपकाराच्या ओझ्याखाली ठेवलं! 

जी.ए. अखेरच्या आजारपणामध्ये सुद्धा कुणालाही न कळवता इस्पितळात दाखल झाले.
अर्थात सुनिताबाई आणि पु.ल. देशपांडे ह्यांना ह्याचा पत्ता लागला आणि त्यांनी त्यांच्या नात्यातली स्नेह आणि प्रेम वापरण्याचा प्रयत्न केला पण त्याही वेळी जी. एं. नी आपला संकोच व स्वत:बद्दलची आलिप्तता कायमच ठेवली.

अखेर जी.ए गेले…. 

ज्या दिवशी जी.ए गेले त्या दिवशी मी त्यांच्या पुस्तकातील पाठ असलेली पानं स्वत:शीच म्हणत राहिलो.

Graveyardमध्ये Funeral साठी आलेल्या Priest सारखा!

 नंतर मला अनेकदा अस वाटायचं कि आपण ‘इस्किलार अल सेरेपी एली’ म्हणावं आणि जी.ए. प्रगट होतील.

पण तसं काही झालं नाही. तस काही होत नाही हीच नियती असते असंच तर जी.ए. नी लिहून ठेवलं होतं न…

पण नियतीचा योगायोग म्हणजे २०१० मध्ये लेखक विलास साळुंखे यानी जी.ए कुलकर्णी ह्याचं ‘इस्किलार’ आणि इतर कथांच’  ‘A Journey Forever’ ह्या नावाने अप्रतिम भाषांतर केलं.

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प्रकाशकांनी Oxford मधील त्या पुस्तक प्रकाशन समारंभात Guest of honour म्हणून पुस्तक प्रकाशन करण्यासाठी आणि इस्किलार आणि इतर कथांवर बोलण्यासाठी मला आमंत्रित केलं.
हा निव्वळ व निव्वळ योगायोग होता…

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जी. एं च्या  इस्किलार’च्या इंग्रजी प्रकाशनाच्या वेळी Oxford मध्ये बोलताना माझ्या मनात राहून राहून एकच वाटत होत, 

‘अरेच्च्या जी.ए नवसाला पावतात की!’

जी. एं च्या ‘सांजशकुन’ ह्या कथा संग्रहात समुद्र नावाची कथा आहे.

त्यातील शेवटची ओळ माझ्या बाबतीत घडून आली.

              ‘समुद्र आता शांत आहे!’ 

जी.ए. ना माझं खूप खूप प्रेम आणि वाढदिवसाचा केक.    

            GAK          

raju.parulekar@gmail.com

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माया

​मायेचा त्याग ही बोधकथा आहे.  हे ज्ञान अस्तित्वगत नाही. म्हणुन मुलभुत सत्यही नाही. कुणी सांगितलं की ही माया आहे म्हणून? कुणीतरी दुसऱ्याने ना? जन्मासोबत हे ज्ञान नव्हतं तुम्हाला!
महर्षि व्यासानी कृष्ण या नायकाच्या तोंडून सांगितलेल्या परस्परविरोधी बोधकथा म्हणजे गीता…. तो धर्मग्रंथ नव्हे. किंबहुना या जगात कुठेही, कुठचेही पुस्तक हे धर्मग्रंथ नाहीत.

आज कसे जगावे हे सांगायला कोणताही प्रेषित हा “नवनीत” गाइड लिहुन गेलेला नाही! तुमचे तुम्ही! भीती व असुरक्षितातेपोटी तुम्ही पुस्तक कुरवाळा, मंत्र म्हणा, नमाज पढ़ा,घंटा वाजवा, मासला जा किंवा बुवा-बाई गाठा.

सत्य हे आहे की तुम्हाला एकटेपणाच्या स्वातंत्र्याचे भय नि आतला अंधार जगु देतं नाही आहे!

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कट

​कोणतीही योजनाबद्ध गोष्ट ही conspiracy (कट) असते.
आयुष्य योजनाबद्ध नसते.
ते तसे बनवण्याचा प्रयत्न आपण करतो.
त्यामागे भविष्याची चिंता, भिती व तजवीज असते.
तिथुनच आयुष्य हे एक कट (conspiracy) बनते.
आपण कटवाले( conspirators).
मग आपल्याला वर्तमानापेक्षा नॉस्टालजिया रम्य वाटतो.
हे भासमान जग असते.
ते परत कधीच येत नाही.
आपणही आयुष्य आयुष्यावर सोडून देतं नाही.
वर्तमान मग दुःखं देतं.
आपल्या conspiracies कधी छोट्या असतात,कधी मोठ्या.
कधी सकारात्मक वाटतात पण त्या निसर्गविरोधी असल्याने त्यातुन दुःखाचे विष झिरपत रहाते.
सुख ही एक कल्पना उरते.
पश्चाताप हा एक बिचारा उपाय असतो.
तो खोटा असतो कारण तो नपुंसक असतो.
तो कश्यालाच भिडत नाही.
आपण खोटे आहोत हे आपल्याला कळते.
मग आपण पुनर्रजन्माची वाट पाहतो.
तो नसतो.
एका कटाचा शेवट एका भ्रमात होतो.
आयुष्य तेव्हढे जगायचे राहुन जाते.
जे जगणे सर्वात सोपे असते.
Choice is yours…

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स्वातंत्र्य व संघटन

​सर्व राजकीय व धार्मिक संघटना ढोंगी असतात…
फक्त मात्रा बदलते…
सर्व व्यक्ति ढोंगातुन बाहेर पडण्याच्या प्रयत्नात असतात…
असुरक्षितता व भय त्यांना थाबंवते…
हा संघर्ष आयुष्यभर चालु रहातो…
तो यशस्वी होत नाही…
ही शोकांतिका व्यक्तीच्या दुःखाचं मुळ कारण बनते..
मग व्यक्ति एक नायक शोधतात…
तो नायक त्यांच्यातच लपलेला/लपलेली असते…
भय व असुरक्षितता हे मान्य करू देतं नाहीत…
स्वतंत्र माणूस असा अनुयायी बनतो…
यावर उपाय नाही…
प्रेषिताना हा उपाय सापडला असावा असे मानले जात आहे…
परंतु हे ज्ञान परावर्तित होउच शकत नाही…
हा स्वतंत्र माणूस या कलेचा अंत असतो…
अज्ञान ही भूल देणारी नशा आहे…
तो उपाय केमोथेरेपी सारखा आहे…
Choice is not yours…

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